एक अनकही विदाई की अनुगूँज
@aayogi_the
किसी ने विदा नहीं कहा, फिर भी जाने की आहट चारों ओर है,जैसे भीतर का कोई दीप बहुत पहले बुझ चुका हो और अब केवल उसकी राख बोल रही हो।
शायद संसार से मोह उसी क्षण मर जाता है, जब आँखें भीड़ में चेहरों को नहीं, केवल खोई हुई मनुष्यता की परछाइयाँ देखना शुरू कर देती हैं।
फिर एक दिन मन शिकायत करना भी छोड़ देता है,,,न संसार से, न लोगों से, न उन परिस्थितियों से जिन्होंने भीतर की कोमलता को धीरे-धीरे कठोर मौन में बदल दिया। कोई आक्रोश शेष नहीं रहता, कोई प्रतिवाद नहीं; बस भीतर कहीं एक अनाम-सी उदासी जन्म लेती है, जो शब्दों की सीमा से बहुत आगे जाकर आत्मा के किसी अज्ञात प्रदेश में अपना घर बना लेती है।
शायद मनुष्य संसार से तब नहीं ऊबता, जब उसे दुःख मिलता है; वह तब थकता है, जब दुःख का अर्थ ही बदल जाता है,,,,जब पीड़ा तमाशा बन जाए, अन्याय सामान्य दृश्य और संवेदना किसी बीते हुए युग की स्मृति।
फिर वही परिचित रास्ते अपरिचित लगने लगते हैं। वही चेहरे, वही आवाज़ें, वही संबंध सब कुछ उपस्थित होते हुए भी जैसे किसी अदृश्य दूरी के उस पार खड़ा दिखाई देता है। मन उनके बीच रहता है, मगर उनसे जुड़ नहीं पाता। जैसे कोई यात्री बहुत देर तक किसी ऐसे नगर में ठहरा रहा हो, जहाँ उसकी आत्मा कभी पहुँची ही न हो।
और तब समझ आता है कि कुछ विदाइयाँ पैरों से नहीं होतीं। मनुष्य वहीं रहता है, वही साँस लेता है, उन्हीं गलियों से गुज़रता है,,,,लेकिन उसके भीतर से उस संसार का अस्तित्व धीरे-धीरे विलीन होने लगता है, जिससे कभी उसे अपनापन था,,,,,
शायद यही वह क्षण है जब संसार मनुष्य के भीतर से अपना अर्थ खो देता है।
और तब विदाई कोई शब्द नहीं रहती,वह एक अनदेखी अनुगूँज बन जाती है, जो बाहर की निस्तब्धता में नहीं, भीतर की गहराइयों में सुनाई देती रहती है।
किसी को पता भी नहीं चलता कि कोई व्यक्ति जा चुका है ,बहुत दूर, बहुत भीतर, वहाँ जहाँ लौटने के लिए कोई मार्ग नहीं होता। पीछे केवल उसका मौन रह जाता है; और उस मौन में एक ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर शायद संसार के पास कभी था ही नहीं।
अलविदा कहने की भी आवश्यकता नहीं
कुछ प्रस्थान इतने निःशब्द होते हैं कि उनके लिए केवल एक बुझती हुई लौ पर्याप्त होती है।
अलविदा की अनुगूँज लिए यह संसार अब अपना नहीं लगता, जहाँ करुणा हार रही है और अन्याय रोज़ अपना विस्तार लिख रहा है।
जहाँ मानवता ही दम तोड़ दे, वहाँ मन का ठहरना नहीं,,उससे मौन विदा लेना ही स्वाभाविक है।🙏