समस्या क्या है ?
2014 के पहले जितनी भी गैर कांग्रेसी सरकारें बनी, वे अधिक समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकीं।
कारण यह था कि सरकार तो बन जाती थी लेकिन पूरे तंत्र के अंदर कांग्रेसी ही भरे रहते थे। चारे ब्यूरोक्रेसी हो, ज्यूडिशियरी हो या मीडिया हो।
सरकार बनने के बाद डे वन से कांग्रेस उन्हें गिराने, अस्थिर करने में अपनी पूरी शक्ति लगा देती थी और अंततः उन्हें निबटा देती थी। उसके बाद या तो वे गठबंधन सरकारें बनतीं जो कांग्रेस की पपेट रहतीं या स्वयं कांग्रेस ही सत्ता के केंद्र में रहती।
चाहे मोरारजी देसाई के बाद चौधरी चरण सिंह रहे, वी पी सिंह के बाद चंद्रशेखर रहे या फिर देवगौड़ा या गुजराल प्रधानमंत्री रहे, इनकी नकेल हमेशा कांग्रेस के हाथ में रही।
कांग्रेस ने न मोरारजी देसाई को सरकार चलाने दिया, न वी पी सिंह को और न ही वाजपेयी को।
यहाँ तक कि वाजपेयी की लोकप्रियता भी तब काम न आ सकी जब भाजपा द्वारा मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात के तत्कालीन चुनावों को जीतने के बाद समय से एक वर्ष पूर्व ही लोकसभा चुनाव करवा लिया था। वे बेहद नैरो मार्जिन से 2004 का लोकसभा चुनाव हार गए थे।
तब सबको आश्चर्य भी हुआ था, क्योंकि वाजपेयी के खिलाफ कोई एंटीइनकम्बेन्सी का माहौल नहीं था। सच तो यह है कि वे कांग्रेस के तंत्र से चुनाव हार गए थे। वे सरलमना व्यक्ति थे और उन्होंने अपने कार्यकाल में इस मुद्दे पर कोई ध्यान ही नहीं दिया कि सिर्फ सरकार बना लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सिस्टम पर कब्जा करना भी जरूरी है।
लेकिन २०१४ के बाद स्थिति तब बदल गयी जब मोदी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद इनटॉलरेंस के नाम पर अवार्डवापसी गिरोह सबसे पहले सामने आया। मतलब अभी नवव्याहता सरकार के हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि उसे विधवा बनाने के कुचक्र रचे जाने लगे।
इसी दौर में देश के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध कई जजों ने प्रेस काँफ्रेंस भी किया।
मोदी वाजपेयी जी जैसे सीधे - साधे नहीं ठहरे। वे गुजरात में लगातार तीन बार कांग्रेस के कुचक्र को कुचल चुके थे। उन्हें लग गया कि अगर लंबे समय तक टिकना है तो सिर्फ गवर्नेंस से काम नहीं चलने वाला। अंदर भी पैठ जरूरी है।
फिर तमाम प्रशासनिक अधिकारियों को वी आर एस देकर भगाना पड़ा।
सारे संस्थानों में उन लोगों की शक्तियों को को न्यूट्रलाइज किया गया जो सरकार बनने के बाद भी सरकार के साथ नहीं थे।
परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस केंद्र में तो आई नहीं, धीरे- धीरे उन प्रदेशों से भी साफ होती गयी, जहाँ वह एक आल्टरनेशन में सत्ता पा लेती थी।
ऐसे में राहुल गाँधी का पागल हो जाना स्वाभविक ही है कि इतने अंतराल के बाद भी ऐसी एंटीइनकम्बेन्सी क्यों नहीं हो रही कि भाजपा सत्ता से जाए और कांग्रेस आ जाए।
समस्या यह नहीं है कि भाजपा के खिलाफ एंटीइनकम्बेन्सी नहीं हो रही, समस्या यह है कि भाजपा से नाराजगी के बाद भी लोग कांग्रेस को उसका विकल्प मानने को तैयार नहीं।
वरना कोई भी सरकार अगर अलोकप्रिय हो जाय और लोगों को यह विश्वास हो जाय कि विपक्ष सरकार से बेहतर है तो चाहे मीडिया खिलाफ हो, ब्यूरोक्रेसी खिलाफ हो, जुडिशियारी खिलाफ हो या इलेक्शन कमीशन, बदलाव होकर रहता है।
इंदिरा गाँधी का हारना, राजीव गाँधी का हारना और मनमोहन सिंह का हारना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
इसलिए वोट चोरी, EVM और ज्ञानेश कुमार पर अपनी छाती पीटने के पहले कांग्रेस को अपना घर दुरुस्त करना चाहिए।