27 साल पहले कोलकाता की एक सड़क पर, किसी ने एक नवजात बच्ची को लावारिस कूड़े के ढेर के पास रोते-बिलखते छोड़ दिया था। शायद उस नन्ही जान के लिए दुनिया वहीं खत्म हो जाती... लेकिन नियति ने उसके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। राहगीरों की नजर उस पर पड़ी, किसी भले मानुस ने तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाया और अस्थायी आसरा दिया।
अगले दिन सुबह के अखबार में एक छोटी सी खबर छपी—कूड़े के ढेर में मिली नवजात बच्ची।
उस रोज यह खबर लाखों लोगों ने पढ़ी, अफसोस जताया और पन्ना पलट दिया। लेकिन एक शख्स ऐसा था जिसके दिल पर इस खबर ने सीधा वार किया। वह थे बॉलीवुड के 'डिस्को डांसर'—मिथुन चक्रवर्ती।
खबर पढ़ते ही मिथुन दा बिना एक पल गंवाए अस्पताल पहुंच गए। उन्होंने न सिर्फ बच्ची का हाल देखा, बल्कि फैसला किया कि वे इस नन्ही जान को लावारिस नहीं रहने देंगे। जब उन्होंने यह बात अपनी पत्नी योगिता बाली से कही, तो मां के दिल ने भी बिना किसी झिझक के हामी भर दी। पूरी रात अस्पताल में बच्ची के पास रहकर, तमाम कानूनी प्रक्रियाओं को पूरी ईमानदारी से निभाते हुए उस बेसहारा बच्ची को हमेशा के लिए अपना लिया गया।
नाम रखा गया—दिशानी चक्रवर्ती।
घर में पहले से तीन बेटे थे—महाअक्षय (मिमोह), उष्मे और नमाशी। लेकिन दिशानी के आते ही वह पूरे परिवार की सबसे लाड़ली बन गई। किसी भेदभाव के बिना, उसे वही प्यार, वही परवरिश और वही पंख दिए गए जो किसी भी अपने बच्चे को दिए जाते हैं।
वक्त बदला, और उस नन्ही बच्ची की मेहनत व माता-पिता के भरोसे ने रंग दिखाया। न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी से अभिनय की पढ़ाई पूरी कर, आज दिशानी हॉलीवुड की शॉर्ट फिल्मों और थिएटर में अपनी पहचान बना रही हैं।
आज भी जब लोग सोचते हैं कि "गोद लेना" सिर्फ एक कानूनी औपचारिकता है, तो मिथुन दा और योगिता जी की यह कहानी याद आती है। गोद लेना सिर्फ एक दस्तावेज पर दस्तखत करना नहीं होता, यह आत्मा से जुड़ने और किसी को अपने दिल की सबसे महफूज जगह देने का नाम है। खून के रिश्ते तो कुदरत बनाती है, मगर प्यार और इंसानियत के रिश्ते इंसान अपने कर्मों से गढ़ता है।
आज भी हमारे समाज में बेटियां कई बार गैर समझी जाती हैं, अनाथालय भरे पड़े हैं और गोद लेने की प्रक्रिया को लेकर कई तरह की झिझक मौजूद है। काश, हम सब इस कहानी से यह सीख पाएं कि किसी का सहारा बनने के लिए सिर्फ सामर्थ्य नहीं, एक बड़े दिल की जरूरत होती है।
एक बच्ची, जिसे किसी ने कूड़े के ढेर के हवाले कर दिया था, आज स्वाभिमान से सिर उठाकर दुनिया का सामना कर रही है—सिर्फ इसलिए क्योंकि एक पिता ने सही वक्त पर हाथ थाम लिया था।
सच्चा हीरो पर्दे पर मुक्के चलाने वाला नहीं होता, सच्चा हीरो वह होता है जो किसी उजड़ती हुई जिंदगी को संवार दे।