अतुल सुभाष का आत्महत्या करना दुखद है. लेकिन इस केस का सहारा लेकर मर्दों का “मी टू” ट्रेंड करवाकर ये दिखाना कि वो और बाकी मर्द कितने प्रताड़ित हैं, चरम हिपॉक्रसी है. क़ानून का ग़लत इस्तेमाल होता है, लेकिन कितने फीसदी मामलों में? क्या उन अनगिन मामलों से भी ज़्यादा, जिनकी वजह से क़ानून बनाने और बनाए रखने की ज़रूरत पड़ी? भारतीय पुरुष और चाहे जो हों, बतौर समुच्चय बिचारे शोषित उत्पीड़ित तो कतई नहीं हैं.